मिली रंज-ओ-ग़म से न फ़ुर्सत कभी है
न उम्मीद की कोई शम्मा जली है
निगाहों ने देखी न रोशन फ़जाएं
न दामन ने चूमीं महकती हवाएं
बहा अश्क बन कर लहू हसरतों का
खिली कोई दिल में न अब तक कली है
मिली रंज -ओ- ग़म से न फ़ुर्सत कभी है
न उम्मीद की कोई शम्मा जली है
बहारों के दामन जले नफरतों से
लगाएं शजर हम कहां उल्फतों के
ख़यालो की नगरी में ज़ुल्मत का साया
मुहब्बत की सुनसान हर इक गली है
मिली रंज-ओ- ग़म से न फ़ुर्सत कभी है
न उम्मीद की कोई शम्मा जली है
तबस्सुम में डूबे गुलों को न देखा
न पीको बुलाते पपीहों को देखा
न गुज़रा मेरा कोई दिन मुस्कुरा कर
न सो कर कोई रात मेरी ढली है
मिली रंज-ओ- ग़म से न फ़ुर्सत कभी है
न उम्मीद की कोई शम्मा जली है
Asad Khan Lakhimpuri (Barwar)