वीरेन्द्र खरे 'अकेला'

ये मत सोचो हमने हिम्मत हारी है
बरसों से चप्पल चटकाना जारी है

अंदर से सब के सब सुलगे बैठे हैं
ये जयकारे लोगों की लाचारी है

काम जहन्नुम में जाने के हैं सारे
किस दम पर जन्नत की दावेदारी है

उनका ही जलवा है दौरे हाज़िर में
जिनमें अव्वल दर्ज़े की मक्कारी है

इतना भी मीठा-मीठा मत बोला कर
देख शुगर की मुझको तो बीमारी है

तुमको जो करना था तुम कर गुज़रे हो
अब छोड़ो मैदान, हमारी बारी है

आग उगलते हैं अश'आर 'अकेला' के
मिसरा-मिसरा लफ़्ज़ों की चिंगारी है
वीरेन्द्र खरे 'अकेला'