किसको मालूम क्या कमी निकली
बात निकली तो फिर बुरी निकली
हमने दरिया समझ लिया जिसको
उसकी आँखों में तिश्नगी निकली
घर जलाकर वो पूछते हैं अब
राख में किसकी रौशनी निकली
जब भी ख़ुद को तलाशना चाहा
मेरी ख़ामोशी अजनबी निकली
फ़ैसला हक़ में हो गया मेरे
फिर भी आँखों में कुछ नमी निकली
बारहा जिसको पूजा हूँ कामिल
उसकी बुनियाद तक गिरी निकली
Kunal kumar