मैं पथिक! पथ पर बहुत आनंदमय हूँ

तिमिरमय जग में विभा सब खोजते हैं
मैं अँधेरों में पला आलोकमय हूँ
ज़िन्दगी के लक्ष्य तुमको हों मुबारक
मैं पथिक!
पथ पर बहुत आनंदमय हूँ

साधना मेरी किसी सम्मान की प्यासी नहीं है
कर्मों की आराधना दरबार की दासी नहीं है
मैं दुःखों का स्वाद लेकर जी रहा हूँ
कल्पना मेरी सुखों की किंचित भी अभिलाषी नहीं है
शोक के जिन चक्रवातों में डूबता है जगत सारा
मैं उसी धारा प्रबल में, शांति से प्रवाहमय हूँ
मैं पथिक!
पथ पर बहुत आनंदमय हूँ

मुझको इच्छा ही नहीं कि देवता वरदान दें
विश्व अभिनंदन करे और लोग सब सम्मान दें
इस धरा से उस गगन तक, मैं विरक्ति का उपासक
ईश से अनुनय यही अनासक्ति को उत्थान दें
तिमिर के गिरिवर गहन में मैं सतत् गतिमान होकर
जगत के कल्याण हित में, मैं सदा प्रकाशमय हूँ
मैं पथिक!
पथ पर बहुत आनंदमय हूँ

जग मुझे चाहे, सराहे और ना ही प्यार दे
कृतज्ञता ज्ञापित करूँ ऐसा नहीं उपहार दे
मैं हूँ अभ्यासी अभावों का मुझे ना भाव दे
चाह मुझको कब रही मुझे प्रेम यह संसार दे
मुझको किसी के नेह के आधार ने जीवन दिया है
मैं उसी राग के आनंद में अनुरागमय हूँ
मैं पथिक!
पथ पर बहुत आनंदमय हूँ।
Kumar Vivek

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