नफरतों के इन अंधेरों को मिटाने के लिए
कौन आए अम्न का दीपक जलाने के लिए
अब गड़े मुर्दे निकाले जा रहे हैं रात दिन
लग गए फिर साँप रस्सी को बनाने के लिए
उनके मुँह को लग गया है बेगुनाहों का लहू
ख़ूँ बहाते फिर रहे कुर्सी बचाने के लिए
शहर वीरां हो गया है दब गईं चीख़-ओ-पुकार
फिर बचा ही क्या है जामी अब सुनाने के लिए
MOHAMMAD RAFAY JAAMI