यह जो मुख पर आज उदासी झलक रही है,
अरे चन्द्रमा! टूट गया क्या मान तुम्हारा?
देख अवनि पर चन्द्रमुखों की धवल चन्द्रिका,
कहाँ गया वह उज्ज्वलता का भान तुम्हारा?
अधर उषा की आज अरुणिमा लजा सकेंगे।
नयन निशा की नीरवता इस बार कहेंगे।
केश शिखर पर फिर उन्मादित पुष्प थकेंगे।
मुख-मकरंद मधुप-मन के अवलंब बनेंगे।।
करक चौथ के चन्द्र! न्यूनता तुम्हें खलेगी,
रूप प्रेयसी का कर लेगा पान तुम्हारा।
अरे चन्द्रमा! टूट गया क्या मान तुम्हारा?
कहीं पायलें खग-दल का कलरव हर लेंगी।
कुछ दंतावलियाँ तारों को फीका कर देंगी।
कहीं अर्घ्य-व्रत से सतियाँ सौभाग्य वरेंगी।
प्रेम पहिन प्रिय-मनरंजक शृंगार करेंगी।
नक्षत्रों में रह धरती पर धरे रहें दृग!
बार-बार भटकेगा रे शशि! ध्यान तुम्हारा।
अरे चन्द्रमा! टूट गया क्या मान तुम्हारा?
रहे पुरातन साक्षी शशि! प्रेमी जन के तुम।
भरते रहे अनगिनत क्षत विरही मन के तुम।
प्रहरी प्रेम पुष्प से सुरभित उपवन के तुम।
देव! सदा हरते तम प्रेमी जीवन के तुम।
अब न धैर्य खोओ तुम देख प्रिया मेरी,
तुमसे ही होगा क्षिति पर आह्वान तुम्हारा।
अरे चन्द्रमा! टूट गया क्या मान तुम्हारा?
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'