वर्षों से इक रीत निभाकर
हम रावण को जला रहे हैं
सुनो समय के देव! बता दो
कब लौटेंगे राम हमारे?
'सदा सत्य की विजय हुई' हम जीवन-भर ये सुनते आए
अंत कहानी का अपनी भी, वही हृदय में बुनते आए
प्रायश्चित से कभी मंथराओं के मन भी पछताएँगे
हृदय थाम कर बैठे हैं हम, राम हमारे कब आएँगे?
हुआ सफल संकल्प विजय का
शंखनाद हो गया समर में
पूर्ण हुआ रण किंतु पूर्ण-
कब होंगे ये संग्राम हमारे?
अब इस युग के लोग विषैले बेर खिलाते प्यार जताकर
'यही दिशा है' कहते बनकर मित्र दिशा विपरीत दिखाकर
और सत्य के लिए लोग अब साथ नहीं लड़ते क़िस्सों में
पहले तय होता है कैसे क्या बाँटेंगे वो हिस्सों में
साध लिए जलते पुतलों से
धर्म-जाति के समीकरण तक
साध सकें जो 'सार' कभी
मन होंगे यूँ निष्काम हमारे?
यूँ तो हम विचलित होते है, ऐसी कितनी ही उलझन में
फिर भी उठती ज्वालाओं सँग ज्वार उठा करता है मन में
जब तक अंतर्मन में बाक़ी राम-विजय की ये अभिलाषा
तब तक इस युग की आँखों में भी बाक़ी है स्वर्णिम आशा
हम करके विश्वास निभाते
सदा रहेंगे रीत हमारी
होंगे जय के पर्व, पक्ष में
होंगे सब परिणाम हमारे!
Swarika Kirti