Dr Wasif Quazi

रूह बेचैन हुआ करती है
रात ख़ामोश रहा करती है

दिल के वीरान मकीनों से न पूछ
किस तरह शाम ढला करती है

तेरी यादों के तसव्वुर में अब
धूप सी रूह फिरा करती है

कोई आहट न सदा करती अब
सिर्फ़ परछाई वफ़ा करती है

दर्द की धूप में जलकर ये नज़र
रास्ते खुद ही चुना करती है

हिज्र के सहरा की बियाबानी में
आग सी कोई जला करती है

फूल खिलने की तमन्ना में ही
शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है
Dr Wasif Quazi