हम तरसते ही रहे बस, एक वफ़ा के वास्ते
इस घुटन सी ज़िन्दगी में, बस हवा के वास्ते
ज़ख़्म सारे, आज मैं ने, फिर हरे हैं, कर लिए
यार की बस, एक मीठी, सी दवा के, वास्ते
उम्र गुज़री है हमारी, झोलियाँ फैलाए बस
यार तेरी इक इनायत, इक अता के वास्ते
आसमानों, की तरफ़ जब, हाथ मैं ने, कर लिए
सब भुला कर, यार तेरी, इक दुआ के, वास्ते
मर्ज़ियों से, अपनी हम ने, छोड़ दी है, बंदगी
इश्क़ की इक, ख़ूबसूरत, सी ख़ता के, वास्ते
झोलियाँ ख़ुद आज ‘क़ाज़ी’, है पसारे दश्त में
सूफ़ियों की इक मुक़द्दस, सी रिदा के वास्ते
Dr Wasif Quazi