राम भीतर जाग जाएँ

​आओ संशय के तिमिर को, हम हृदय से त्याग पाएँ।
काश! व्याकुल मन समर में, राम भीतर जाग जाएँ।।

​स्वार्थ के इस कल्पतरु को,
त्याग की पावन इच्छा दें।
नेह से रीते हृदय को,
शबरी वाली इक तृषा दें।
भ्रातृ-द्रोही इस समय में,
हम विभीषण-बोध साधें।
सत्य के दुर्जेय पथ पर,
धर्म की मर्यादा बाँधें।
सिद्ध हो जीवन हमारा, जो अहिल्या अनुराग पाएँ।
काश! व्याकुल मन समर में, राम भीतर जाग जाएँ।।

​दंभ के दस शीश ढोकर,
घूमते संसार में हम।
छल-कपट के स्वर्ण-मृग के,
पंथ पर लाचार हैं हम।
कब तलक फिर जटायु ही,
पाप से लड़ता मरेगा।
कब तलक नीलकंठ बन कर,
युग विषैला घूँट पिएगा।
आओ बनकर सेतु हम भी, असीम सत्य बेदाग़ पाएँ।
काश! व्याकुल मन समर में, राम भीतर जाग जाएँ।।

​बाँधकर तरकश भुजा में,
एक प्रतिज्ञा आज धर लें।
क्रोध, लोभ, विकार जितने,
भस्म उनका रूप कर लें।
आग भीतर की जगाकर,
दूर सारे क्लेश कर दें।
द्वेष की यह लंक ढहकर,
प्रेम का अवधेश कर दें।
दीप बनकर आत्मा के, ख़ुद-ब-ख़ुद ही जाग पाएँ।
काश! व्याकुल मन समर में, राम भीतर जाग जाएँ।।
Dayanand Tripathi Vayakul