अजब इक ख़ौफ का मंज़र बना डाला हवाओं ने
बहारों का हसीं नक्शा मिटा डाला हवाओं ने
फ़ज़ा में हर तरफ़ वहशत के साए रक्स करते हैं
मुहब्बत के चारगों को बुझा डाला हवाओं ने
कहीं भी रूबरू होती नहीं किरने तबस्सुम की
तसव्वुर भी न था वो दिन दिखा डाला हवाओं ने
रगों में ख़ून हम सबकी इसी मिट्टी के आंचल का
हमें आपस मे अब दुश्मन बना डाला हवाओं ने
यहीं आंखे असद थी जिनमें गुल उल्फ़त के खिलते थे
इन्हें नफ़रत का मयख़ाना बना डाला हवाओं ने
Asad Khan Lakhimpuri (Barwar)