Tabrejraftaar

दिल को मिलती ही नहीं राहत कोई परदेस में,
याद आती है बहुत सूरत कोई परदेस में।

माँ की आवाज़ें, वो आँगन, वो मोहब्बत के दिए
बन गई है दिल की हर चाहत कोई परदेस में।

लोग मिलते हैं मगर अपनों-सा कोई भी नहीं,
काटनी पड़ती है ये ग़ुर्बत कोई परदेस में

रोज़ी की चाहत में घर से दूर आ बैठा हूँ मैं,
अब कहाँ मिलती है वो राहत कोई परदेस में

एक दिन लौटूँगा जब मिट्टी की ख़ुशबू आएगी,
ख़त्म होगी दिल की ये चाहत कोई परदेस में।
Tabrejraftaar