Sohil Barelvi

चाँद-सा ख़्वाब किसी रोज़ छुआ था मैंने
अपनी रातों में ज़रा नूर किया था मैंने

मैं न लौटा जो तेरे पास तो हैरत कैसी
फिर न लौटूंगा दोबारा, ये कहा था मैंने

सामने तेरे गया था मुझे रुसवा करके
ज़िक्र उसका ही तिरे मुँह से सुना था मैंने

सब बुलाते थे उसे नाम से उसके लेकिन
यार का एक अलग नाम रखा था मैंने

साफ़ दिखने लगीं हाथों की लकीरें मुझको
अपने हाथों पे तिरा हाथ लिखा था मैंने

बा-वफ़ा शख़्स पे इल्ज़ाम लगाता कैसे
बेवफ़ा ख़ुद को किसी रोज़ कहा था मैंने

चारागर बाद में आए थे मेरे पास कई
सबसे पहले तो तिरा ज़ख़्म छुआ था मैंने

एक दिन लूट लिया उसका सभी कुछ सोहिल
हाए! अफ़सोस जिसे कुछ न दिया था मैंने
Sohil Barelvi