क्या नहीं तुमको पता, माँ!

क्या नहीं तुमको पता, माँ!
जो तुम्हें कहकर बताऊँ?
तुम मेरा मन सुन रही हो,
गीत तुमको क्या सुनाऊँ?

वे पिता हैं, तो सहज संकोच है उनसे हमारा
माँ तुम्हीं कह दो न उनसे इस हृदय का हाल सारा
वे विधाता हैं, हमें उनका लिखा स्वीकार तो है
पर थके मन को तुम्हारी गोद पर अधिकार तो है

छोड़कर आँचल तुम्हारा
मैं भला किस ओर जाऊँ?

ये युगों से कह रहा संसार इसका सार हो तुम
पार इस संसार के, उस पार का संसार हो तुम
किंतु हम अज्ञानियों को ज्ञान इतना ही रहा है
जो किसी से कह न पाए वो सदा तुमसे कहा है

मौन वो संवाद, शब्दों में
उसे कैसे समाऊँ?

मानती हूँ, हैं अकारण तो नहीं जग की व्यथाएँ
कौन जाने कौन लिखता है जगत की सब कथाएँ?
या हमारी इस कहानी का हमें कुछ सार दे दो
या कहानी में, कहानी को नया विस्तार दे दो

भूमिका अपनी अँधेरों में
भला कब तक निभाऊँ?
Swarika Kirti