Yawar Ali

कुछ जंगजू-ए-मुल्क ही किरदार बेच कर
चूड़ी ख़रीद लाए हैं तलवार बेच कर

हम फिर फ़रेब खा गए मज़हब के नाम पे
फिर हँस रहा है क़ौम को सरदार बेच कर

बेइज़्ज़ती के साए में ख़ुशियाँ उदास हैं
क्या मिल गया है आप को दस्तार बेच कर

अफ़सोस करिए, चीखिए, मातम मनाइए
ख़ुश हो रहे हैं आप तो मेयार बेच कर

तुम किस मुग़ालते में गिरफ़्तार हो मियाँ
सब के हुक़ूक़ खा गई सरकार बेच कर

बेघर तो हो गया हूँ मगर हूँ सुकून में
ख़ुद को ख़रीद लाया हूँ घर-बार बेच कर

हम मज़हबों के नाम पे लड़ते ही रह गए
हिन्दोस्ताँ को खा गए ग़द्दार बेच कर
Yawar Ali