हम कमज़ोर नहीं हैं लेकिन
लक्ष्य हमारे बहुत बड़े हैं
हमको दुनिया के हर खण्डहर
में जाकर है दीप जलाना
हमको हर इक बसते घर की
नीवों को मज़बूत बनाना
हमें बहुत कुछ कहना है बस
इसीलिए चुपचाप खड़े हैं
जो गीले थे, हैं या होंगे
वे सब के सब नयन हमारे
जिनमें चुभे हुए हैं काँटे
वे सब के सब चरण हमारे
उन घायल पाँवों के नीचे
हम कब से गुमनाम पड़े हैं
युद्ध समापन से पहले ही
क्या अपने हथियार फेंक दें
भँवरों के चक्कर से डरकर
क्या अपनी पतवार फेंक दें
हम हैं उन तिनकों के वंशज
जो आँधी से युद्ध लड़े हैं!
Gyan Prakash Akul