मैं भी अब झूठ पर उतर आया
बाद मुद्दत के ये हुनर आया
लाख चाहा मगर न घर आया
मेरे हिस्से में बस सफ़र आया
जो कहीं आसपास था ही नहीं
दूर तक वो ही वो नज़र आया
तुझको पाने से पहले जाने क्यों
तुझको खोने का दिल में डर आया
ज़ोर वो मारता रहा आख़िर
डूबते-डूबते उभर आया
मुझको उम्मीद थी मोहब्बत से
होके उस दर से दर-बदर आया
अपनी हस्ती भी झूठ लगने लगी
होश आया तो इस क़दर आया
डॉ• सचिन चौधरी 'शाश्वत'