बुने थे ख़्वाब आँखों ने हमारे भी, तुम्हारे भी!
अधूरे रह गए सारे, हमारे भी, तुम्हारे भी!
कमी इक दूसरे की कर नहीं पाए कभी पूरी
हज़ारों चाहने वाले हमारे भी, तुम्हारे भी!
न हम तुमको कभी भूले, न तुम हम को कभी भूले
धरे सब रह गए वादे हमारे भी, तुम्हारे भी!
मिले हर बार इज़हार-ए-मोहब्बत के इरादे से
मगर लब पे रहे ताले हमारे भी, तुम्हारे भी!
कोई दौलत कमाई है, कोई रिश्ता निभाया है
ख़ज़ाने भर नहीं पाए हमारे भी, तुम्हारे भी!!
अमारत और ग़ुर्बत ने क़दम रोका किए “रूबी”
खुले थे सारे दरवाज़े हमारे भी तुम्हारे भी!
Rubi Gupta satyendra