कर लिया लहजा नरम तो फिर कड़ाई क्या करें
सामने अपने ही हों तो फिर लड़ाई क्या करें
नाम है, शोहरत है, पैसा ख़ूब है फिर भी मगर
कर्म जो अच्छे न हो तो फिर बड़ाई क्या करें
हैं किताबें ढेर सारी पास मेरे भी मगर
उनमें तू ही तू दिखे तो फिर पढ़ाई क्या करें
जब विभीषण की तरह अपने ही भेदी हो गए
दुश्मनों के काफ़िले पर फिर चढ़ाई क्या करें
वैद्य भी हालत पे मेरी आज चक्कर खा गया
मैं मरीज़-ए-इश्क़ वो मेरी दवाई क्या करे
DHEERENDRA DHEER