कहां हैं बहारों के मंज़र सुहाने
कहां बुलबुलों के लबों पर तराने
बनारस की रंगीन सुब्हें कहां हैं
अवध की महकती वो शामें कहां हैं
कहां ज़िंदगी के मुनव्वर फ़साने
कहां हैं बहारों के मंज़र सुहाने
कहां बुलबुलों के लबों पर तराने
मुहब्बत के सब खेत बंजर बनें हैं
वो नग़्मात कोयल के खंज़र बने हैं
उजड़ने लगे तितलियों के ठिकाने
कहां हैं बहारों के मंज़र सुहाने
कहां बुलबुलों के लबों पर तराने
असद मैं हूं-ओ-मेरी तन्हाइयां हैं
हर इक सिम्त ज़ुल्मत की परछाइयां हैं
चले हो किसे हाल अपना सुनाने
कहां हैं बहारों के मंज़र सुहाने
कहां बुलबुलों के लबों पर तराने
Asad Khan Lakhimpuri (Barwar)