काँच के शहर में ये ख़्वाब सजाया क्यूँ था
एक बेदर्द से दिल तुम ने लगाया क्यूँ था
ख़ाक में गर था मिलाना ये नशेमन मेरा
प्यार से तुम ने परिंदे को बुलाया क्यूँ था
साथ चल कर जो निभाना न तुम्हें था रिश्ता
बीच रस्ते में मुझे तुम ने रुलाया क्यूँ था
काटनी थी अगर आख़िर शब-ए-फ़ुरक़त तनहा
छीनना था ये सवेरा तो दिखाया क्यूँ था
ज़ख़्म देने के लिए ख़ंजर उठाया था तो
दस्त-ए-नाज़ुक से गले मुझको लगाया क्यूँ था
सिर्फ़ रोना जो मुक़द्दर की इबारत था तो
तू ने इक पल के लिए मुझ को हँसाया क्यूँ था
जानते थे कि हवाओं में बग़ावत होगी
दीप चौखट पे वफ़ा का यूँ जलाया क्यूँ था
ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में बहुत ख़ुश मैं अकेला यारो
नींद से तल्ख़ हक़ीक़त में जगाया क्यूँ था
क़त्ल 'काज़ी' का अगर तुझको ही करना था तो
तीर नज़रों का जिगर पर ये चलाया क्यूँ था
Dr Wasif Quazi