Dr Wasif Quazi

हस्ती का हर ग़ुरूर, फ़क़त नाम ही तो है
आख़िर ये मौत भी तो, नया जाम ही तो है

मायूस हो के आस का दामन न छोड़ तू
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

साँसों का सिलसिला ये तमाशा है किस लिए
जीना भी इस जहाँ में कोई काम ही तो है

ख़ामोशियों को मेरी, तु कमज़ोर ना समझ
तूफ़ान के ये आने का, पैग़ाम ही तो है

आज़ाद ख़ुद को जान के, इठला रहा है जो
ये जिस्म भी तो रूह का, इक दाम ही तो है

प्यासों की बेबसी को छुपा कर भी देख लो
आँखों में तिश्नगी का भरा जाम ही तो है

लफ़्ज़ों की सादगी को पहन कर भी देख लो
होठों पे ख़ामुशी का छुपा नाम ही तो है

क़ाज़ी यहां किसी से उमीद-ए-वफ़ा न कर
इंसां की ख़्वाहिशों का ये अंजाम ही तो है
Dr Wasif Quazi