Dr Wasif Quazi

बज़्म-ए-हस्ती की ख़मोशी से सदा आती है
दर्द-ए-दिल में ग़म-ए-जानाँ से शिफ़ा आती है

ज़िंदगी से है तवक़्क़ो कि मिलेगा जानाँ
राह तकते हैं उसी की तो क़ज़ा आती है

रौशनी बाँट रहा था जो मुक़द्दर सब को
मेरे हिस्से में फ़क़त शब की अता आती है

मुद्दतों से जो इबादत में हैं करते सज्दा
पारसाओं के भी लहजे में अना आती है

चाँदनी रात के सन्नाटे में रोकर देखो
गर्म आँसू से निकल कर ये दुआ आती है

हादसों से न शिकायत न गिला है उसको
ज़हर पी कर उसे जीने की अदा आती है

जब पुकारे तुझे दिल से कोई आकर, काज़ी
तेरे शे'रों से मुहब्बत की दुआ आती है
Dr Wasif Quazi

Dr Wasif Quazi | We The Sukhanwar