Faisal Qadri Gunnauri

ज़िन्दगी ग़म के रूबरू ना हुई
यानी चाहत की जुस्तजू ना हुई

जिंदगी भर यूं ही भटकते फिरे
पूरी कोई भी आरजू ना हुई

दिल यूं ही बेकरार है शायद
आज उनसे जो गुफ़्तगू ना हुई

लाख कोशिश के बाद भी यारों
आशिक़ी अपनी सुर्खरू ना हुई

शम्मा कैसी ? जलाई है फ़ैसल
रोशनी जिस की चार सू ना हुई
Faisal Qadri Gunnauri