ख़ून अपना जो बहाया तो मिली आज़ादी
हर सितम ख़ुद पे उठाया तो मिली आज़ादी
हाथ पे हाथ भला रखने से क्या होता है
हाथ अपना जो बढ़ाया तो मिली आज़ादी
मौत भी मिलती नहीं माँगने से हम को यहाँ
ख़ुद को फंदे पे झुलाया तो मिली आज़ादी
सर झुकाना ही नहीं आया तो क्या ही करते
अपने सर को जो कटाया तो मिली आज़ादी
क़र्ज़ मिट्टी का भला हमसे अदा हो कैसे
ख़ुद को तुर्बत में मिलाया तो मिली आज़ादी
सिर्फ़ चरखे से नहीं हमको मिली हुर्रीयत
नफ़्स कितनो ने गवाया तो मिली आज़ादी
Dheeraj kumar verma