प्रिये तुम्हारे चरण त्याग द्वै

प्रिये तुम्हारे त्याग चरण द्वै,
फिर मिला कहीं विश्राम कहाँ!

सञ्चित सुधि की मधुकरियों का,
नित भोग लगाती जाती हूँ।
आर्द्र-नयन के पलक-विपिन में,
मन जोग जगाती जाती हूँ।

बीत रही सदियां पलछिन में,
पर दो पल को आराम कहाँ!

इस जीवन का मंचन करते,
सब लोक-शोक आहार्य रहे।
बस एक तुम्हीं जो शब्द-ब्रह्म,
शाश्वत गति में अनिवार्य रहे।

हैं कई तीर्थ जग में लेकिन,
प्रिय चरणों से अभिराम कहाँ!

होती मंत्रों सी पावन तो,
लिपट तुम्हारे उपवीतों से।
कर लेती अपना सिद्ध-वाक्
वंदन के सन्ध्या-गीतों से।

एक तुम्हारा हृदय छोड़कर,
कोई मेरा सुखधाम कहाँ!
GARIMA MISHRA