अब यह भिक्षा पात्र तुम्हारे द्वार नहीं आयेगा राजन

कितनी बार बजायी साँकल
कितनी बार पुकारा तुमको
जैसे जो भी हो सकता था
वैसे किया इशारा तुमको

पल-पल बीता और साथ ही मन का होता रहा विभाजन
अब यह भिक्षा पात्र तुम्हारे द्वार नहीं आयेगा राजन

अभिलाषा की चिताभूमि पर
कुण्ठा के बरगद उगते हैं
उन पर बैठे गिद्ध हमेशा
सपनीली आँखें चुगते हैं

कुण्ठा अहंकार की माँ है ऐसा कहते हैं ज्ञाता जन
अब यह भिक्षा पात्र तुम्हारे द्वार नहीं आयेगा राजन

अहंकार ने सदा पिलाया
सच्चाई को विष का प्याला
अहंकार देता आया है
सदा सत्य को देश निकाला

यही बताना था, आया था सुनो अन्यथा आता आज न
अब यह भिक्षा पात्र तुम्हारे द्वार नहीं आयेगा राजन
Gyan Prakash Akul