Rajesh Reddy

काश! इक ऐसी नींद सो लूँ मैं
मौत आए तो आँख खोलूँ मैं

क्या उमीदें रखूँ उमीदों से
ख़ाली जेबों को क्या टटोलूँ मैं

ज़िंदगी का यही तक़ाज़ा है
साथ हर इक हवा के हो लूँ मैं

ख़्वाब में डूब जाये मेरी नींद
नींद में ख़्वाब को डुबो लूँ मैं

कल जो रोएगी मुझको मेरे बाद
ऐसी दुनिया को आज रो लूँ मैं

एहतराम आपका तभी तक है
जब तलक ये ज़ुबॉं न खोलूँ मैं

ज़िंदगानी से वाक़फ़ीयत है
इससे आगे तो क्या ही बोलूँ मैं

ख़ुदकुशी के बग़ैर ही न कहीं
ज़िंदगानी से हाथ धो लूँ मैं
Rajesh Reddy