Dr Wasif Quazi

ताजिर-ए-दर्दो-अलम हूँ, मैं ज़माने के लिए
पास अश्कों का ख़ज़ाना है, लुटाने के लिए

ज़िंदगी ने दर्द सारे, बख़्श डाले मुफ़्त में
एक लम्हा भी न छोड़ा, भूल जाने के लिए

ख़ाक में तब्दील कब के, हो चुके हैं ख़्वाब सब
आ गए हैं सामने वो, दिल जलाने के लिए

रो रहे थे हम अकेले, दर्द की बरसात में
अश्क़ सारे पी लिए हैं, मुस्कुराने के लिए

लोग आते हैं तमाशा, देखने को आज भी
सज गई है बज़्म-ए-दिल अब, ग़म सजाने के लिए

ज़िन्दगी की शाम अब तो, ढल चुकी है ऐ ख़ुदा
अब हवाएँ मत चला तू, लौ बुझाने के लिए

उम्र भर 'क़ाज़ी' रहे हैं, हम ख़रीदार-ए-वफ़ा
जान ही बाक़ी बची है, अब गँवाने के लिए
Dr Wasif Quazi