Aliem U khan

अब मुकम्मल शीशा-ए-दिल तोड़ दे
या मैं टूटा हूं जहां से जोड़ दे

थक गया दुनिया के इस दस्तूर से
अब मिरा रुख़ अपनी जानिब मोड़ दे

कब कहा सब कुछ अता कर दे मुझे
हां मगर इक शय कोई बे-जोड़ दे

दश्त-ओ-सहरा, सब शजर इंसान के
क्या परिंदा आसमां भी छोड़ दे?
Aliem U khan