कैसी उलझन ला रही है नौकरी
लफ़्ज़ मेरे खा रही है नौकरी
इस तरफ़ से मैं सफ़र को जा रहा
उस तरफ़ से आ रही है नौकरी
हर किसी के हाथ को आती नहीं
हर किसी को भा रही है नौकरी
पढ़ रहे शहरों में सब कुछ हार के
माँ के कंगन खा रही है नौकरी
रोज़ जुड़ते जा रहे हैं ख़्वाब जो
ख़्वाब मेरे खा रही है नौकरी
दौर-ए-आई में हम किससे कहें
हाथ आई जा रही है नौकरी
Ajay Rahul