मुझसे नज़रें चुरा रहा है वो
लगता है दूर जा रहा है वो
ज़िंदगी मुख़्तसर न हो जाए
हर क़सम झूठी खा रहा है वो
उसको अपना कहें या बेगाना
ज़ख़्म देकर हँसा रहा है वो
आग देकर मिरे गुलिस्ताँ को
इक नया गुल खिला रहा है वो
उसकी क़समों पे एतिबार न कर
तुझको फिर से फँसा रहा है वो
Nasir Hayaat