अब दुआ का असर नहीं होता
ग़म तिरा मुख़्तसर नहीं होता
हर तरह से सजाके देख लिया
तेरे बिन ख़ुश ये घर नहीं होता
इश्क़ में गिर के फिर सँभलने का
पास सबके हुनर नहीं होता
कच्ची उम्रों में गर जो धोका मिले
फिर यक़ीं उम्र भर नहीं होता
जिसमें माँ-बाप की न गूँजे हँसी
ख़ूबसूरत वो घर नहीं होता
Nasir Hayaat