देह पानी थी हमें इक दूसरे की, पा चुके हैं
क्यों न अब हम प्यार का नाटक
यहीं पर ख़त्म कर दें!
प्यार को बदनाम करने में कसर हमने न छोड़ी
वासनाओं को रुपहले आवरण हमने दिये हैं
भावनाओं पर नियंत्रण कर नहीं पाये कभी भी
सभ्यता के साथ वर्जित आचरण हमने किये हैं
तुम हमारा हम तुम्हारा मन बहुत बहला चुके हैं
चिह्न सब सम्बंध के वाचक
यहीं पर ख़त्म कर दें!
आग से पानी मिलाकर देखना ही था हमें तो
भाप बनकर उड़ गयी हर एक जिज्ञासा हमारी
है बहुत संभव कि हम इक दूसरे को मार डालें
अब बदलने भी लगी है दिन-ब-दिन भाषा हमारी
स्वप्न में देखे गये वे चित्र सब धुँधला चुके हैं
जो गढ़े थे प्यार के मानक
यहीं पर ख़त्म कर दें!
यह समय की माँग है हम भूल जायें हर कहानी
तुम किसी से क्या कहोगी मैं किसी से क्या कहूँगा
तुम किसी के साथ फेरे घूम अर्धांगिनि बनोगी
मैं कहीं सिन्दूर बन सिन्दूरदानी में रहूँगा
खींचने को लोग दोनों ओर से ही आ चुके हैं
आज अपने बीच का चुम्बक
यहीं पर ख़त्म कर दें!
Gyan Prakash Akul