SHADAB ASGHAR

बिछड़ते वक़्त भी हिम्मत नहीं जुटा पाया
कभी किसी को गले से नहीं लगा पाया

किसी को चाहते रहने की है सज़ा पाई
मैं चार साल में उसको नहीं भुला पाया

वो पहला इश्क़ मुझे याद है, मगर गम ये
के उससे आज भी पीछा नहीं छुड़ा पाया

कई सवाल थे जिनके जवाब देने थे
मगर मैं वक़्त पे कोई जवाब ना पाया

बहुत सँभाल के रखा था दिल को दुनिया से
मगर वो इश्क़ में टूटा, नहीं बचा पाया
SHADAB ASGHAR