पराये मुल्क में पैसा नहीं बनाऊँगा
मैं तुम को छोड़ के दुनिया नहीं बनाऊँगा
मैं अपने शौक़ पुराऊँगा अपने पैसों से
ज़मीन बेच के बंगला नहीं बनाऊँगा
कमाने के लिए अर भी हुनर हैं पास मेरे
ग़ज़ल की भूख को धंधा नहीं बनाऊँगा
मुझे भी शौक़ है दुनिया में कुछ बनाने का
मगर ज़मीर को सस्ता नहीं बनाऊँगा
किसी के नक़्श-ए-क़दम पर नहीं चलूँगा मैं
मैं अपने आप को वैसा नहीं बनाऊँगा
जहाँ भी बाँट सकूँ रौशनी ही बाँटूँगा
दिया बनाऊँगा, शोला नहीं बनाऊँगा
SHADAB ASGHAR