देखना इक रोज़ ऐसी कुछ कमी हो जाएगी
मेरे हाथों से ही मेरी ख़ुद-कुशी हो जाएगी
जिस्म थककर बैठता है, बैठ जाए राह में
रूह की मंज़िल से फिर भी दोस्ती हो जाएगी
आज जो बातें तुम्हें बिल्कुल समझ आती नहीं
ख़ुद कमाओगे तो हर शय क़ीमती हो जाएगी
आज तक जिसको समझते थे हम अपना हमसफ़र
शहर बदला तो वो लड़की अजनबी हो जाएगी
रोज़ थोड़ा-थोड़ा ख़ुद को बेचता हूँ जिस तरह
एक दिन यूँ मुझमें मेरी ही कमी हो जाएगी
सच कहूँगा तो कई चेहरे ख़फ़ा हो जाएँगे
मेरे अपनों से भी मेरी दुश्मनी हो जाएगी
बाप, भाई, अर बहन,की ज़िम्मेदारी, नौकरी
इनसे जो फ़ुर्सत मिली तो शायरी हो जाएगी
SHADAB ASGHAR