दिन बहुत कम ही बचे हैं दूसरी पारी के बाद
याद धुँधली हो गई है इतनी बीमारी के बाद
हमने दरिया को भी देखा प्यास से मरते हुए
कुछ समंदर और बढ़ जाते हैं दिलदारी के बाद
ख़ुद से फिर आँखें मिलाने का हुनर जाता रहा
एक चेहरे पर कई चेहरे की फ़नकारी के बाद
उम्र भर रिश्ते बचाने की मशक़्क़त की बहुत
राख सब कुछ हो गया छोटी-सी चिंगारी के बाद
शौक़ को रोटी की ख़ातिर दफ़्न करना पड़ गया
हमने फिर छेड़ी ग़ज़ल इक जॉब सरकारी के बाद
इश्क़ का था क़ाफ़िया और ज़िंदगी की थी रदीफ़
फेल होना लाज़िमी था इतनी तैयारी के बाद
SHADAB ASGHAR