कहीं जब घर का इक हिस्सा गिरा है।
समझिए जिस्म से साया गिरा है।।
कहाँ अब घोंसला तामीर होगा,
हरा-सा पेड़ इक तन्हा गिरा है।।
बिसातों पर कटेंगी गोटियाँ ये,
हमारे हक़ में अब पासा गिरा है।।
उजागर हो गई जादूगरी अब,
ड्रामा का अभी पर्दा गिरा है।।
हुई रुख़्सत तुम्हारी याद भी अब,
बदन का आख़िरी मलबा गिरा है।।
कटेगा हुक्म का इक्का तुम्हारा,
हमारे काट का दहला गिरा है।।
तुम्हारी सल्तनत ख़तरे में है अब,
हमारे हाथ से कासा गिरा है।।
न समझो हिंदू ओ मुस्लिम का झगड़ा,
हमारे मुल्क का नक़्शा गिरा है।।
अभी कुछ साख़ है साहिब की बाक़ी,
अभी बस पीठ से बस्ता गिरा है।।
सभी गिरने पे उसके हँस पड़े थे,
यहाँ इक शख़्स क्या अच्छा गिरा है।।
navin kumar shukla