navin kumar shukla

अब कहां कोई नाम जानते हैं।
तेरा दर, तेरा धाम जानते हैं।।

सच शब ए वस्ल का मेरे मोहसिन ,
चाँद - तारे तमाम जानते हैं।।

हम क्यों बोलें किसी से दुख अपना,
कष्ट सब मेरे राम जानते हैं।।

आप फिर क्यों किसी से बात करें,
आप बस क़त्ल ए आम जानते हैं।।

कुछ ज़रूरत के मारे हैं, हम पर
हर हलाल ओ हराम जानते हैं।।

जाके बैठेंगे पहले सफ़ में ही क्यों,
हम भी अपना मकाम जानते हैं।।

हाँ , बिका है बहुत ही मंहगा वो,
लोग तो अस्ल दाम जानते हैं।।

सामने दिल है और खंज़र भी,
आप तो अपना काम जानते हैं।।

और कितना भटकना है ' सालिक ' ,
चल सफर का कयाम जानते हैं।।
navin kumar shukla