अब कहां कोई नाम जानते हैं।
तेरा दर, तेरा धाम जानते हैं।।
सच शब ए वस्ल का मेरे मोहसिन ,
चाँद - तारे तमाम जानते हैं।।
हम क्यों बोलें किसी से दुख अपना,
कष्ट सब मेरे राम जानते हैं।।
आप फिर क्यों किसी से बात करें,
आप बस क़त्ल ए आम जानते हैं।।
कुछ ज़रूरत के मारे हैं, हम पर
हर हलाल ओ हराम जानते हैं।।
जाके बैठेंगे पहले सफ़ में ही क्यों,
हम भी अपना मकाम जानते हैं।।
हाँ , बिका है बहुत ही मंहगा वो,
लोग तो अस्ल दाम जानते हैं।।
सामने दिल है और खंज़र भी,
आप तो अपना काम जानते हैं।।
और कितना भटकना है ' सालिक ' ,
चल सफर का कयाम जानते हैं।।
navin kumar shukla