कसम झूठी खिलाने की रिवायत तो नहीं है
कहूँ कैसे भला उनसे, शिकायत तो नहीं है
भला करके जताते हो, सरे-महफ़िल ख़ुदाया
यही आदत तुम्हारी है, सख़ावत तो नहीं है
दिखावे के लिए सर को झुका लेना ज़मीं पर
फ़क़त आदत बना लेना, इबादत तो नहीं है
कभी क़समें वफ़ाओं की, कभी नज़रें चुराना
मुहब्बत में बता ऐ जाँ, सियासत तो नहीं है
बड़े मीठे सुख़न से जो, गला रेता गया है
अदावत में छुपी कोई, शराफ़त तो नहीं है
यहाँ 'क़ाज़ी' हमेशा हक़, दबाया ही गया है
भले मुनसिफ़ यहाँ बैठे, अदालत तो नहीं है
Dr Wasif Quazi