कहो सनेही कैसी बीतीं पिछली रातें मेरे बिना
रंग-बिरंगी सुरधनु जैसी
यादें आईं या कि नहीं
इकली कटी पतंग सरीखी
लुटी-लुटाईं या कि नहीं
मिली बसंती मदिर बहारें या बरसातें मेरे बिना
कहो सनेही कैसी बीतीं पिछली रातें मेरे बिना
ज़हर-बुझाई मुझे चाँदनी
लगती रही तुम्हारे बिन
तारे चुभते रहे तीर से
काली रातें थीं नागिन
क्या तुमने भी पाईं कुछ ऐसी सौगातें मेरे बिना
कहो सनेही कैसी बीतीं पिछली रातें मेरे बिना
तितली थीं तो तितली रहतीं
बदली-सी क्यों बदली हो
लगता कुछ पल थल रखकर
जल में फेंकी मछली हो
चलो भला समझी तो तुमने मेरी बातें मेरे बिना
कहो सनेही कैसी बीतीं पिछली रातें मेरे बिना
RadhaKrishna Shukla 'Pathik'