अपनी जड़ता से ही थोड़ा प्यार करो!

यदि चेतनता से वंचित रह जाओ तो फिर
अपनी जड़ता से ही थोड़ा प्यार करो!

ऊंचे-ऊंचे महलों में ही सीमित होकर
है कभी न रह पायी महानता की छाया
छोटी-छोटी कुटिया में ही मिल जाता है
प्रायः मानव जो सद् मानव होकर आया
लघु सुमन जगत की जयमाला बन जाता है
इसलिए न गरिमा को ही तुम स्वीकार करो!

फूलों की शैय्या सच में मिलती किसे यहाँ
पर शूलों की भी राह सदा के लिए नहीं
कुछ समय के लिए घिरती है दुःख की बदली
लेकिन बदली की आह सदा के लिए नहीं
इसलिए फूल की जयमाला यदि रूठी हो
तो काँटों से ही फिर अपना शृंगार करो!

पतझर के आते ही डालें नंगी होतीं
शृंगार सभी वृक्षों का लुट-सा जाता है
फिर भी पीले पत्तों के शुभ पाँवड़े बिछा
स्वागत में जड़ तरु, चेतन पास बुलाता है
इसलिए शत्रु भी यदि अपने घर आ जाए
तो हृदय खोलकर उसका भी सत्कार करो!
RadhaKrishna Shukla 'Pathik'