अंगीकार करूँगा पहले तुम सागर से बूँद बनो।।
मन आरती नयन सरसीरूह
चंदन चाह, प्रेम की रोली
भाव-कपूर बाँह शुचि माला
प्राण-अगरु, वंदन प्रिय बोली
हर सत्कार करूँगा पहले तुम दिनकर से किरण बनो।।
मैं सीपी तुम स्वाति सघन-घन
मैं तृण तुम ढलान की धारा
कैसे कहो रुमाल बाँध लूँ
नीले नभ का वैभव सारा
तन शृंगार करूँगा पहले तुम पर्वत से रेणु बनो।।
काजल-कर्म सुकृत की हिंसा
वंचक रूप तमिस्र मिताई
छद्म छोड़ सब ओढूंगा कुछ
कबिरा की चादर की नाई
भुज भर प्यार करूँगा पहले तुम अनेक से एक बनो।।
RadhaKrishna Shukla 'Pathik'