तन का अधिकारी बनने से
मन पर अधिकार नहीं होता
झूठा है हर परिणय उत्सव
हैं अर्थहीन सारे बंधन
देहों का मिलना क्या मिलना
यदि मिल न सके आपस में मन
मजबूरी तो मजबूरी है
गठबंधन प्यार नहीं होता
तन का अधिकारी बनने से
मन पर अधिकार नहीं होता
किरणों की गर्म भुजाओं में
बंधकर भी ठंडा-ठंडा दिन
सागर के अंक चढ़ी लहरें
रातें काटें तारे गिन-गिन
माली बगिया का मालिक पर
पुष्पों का यार नहीं होता
तन का अधिकारी बनने से
मन पर अधिकार नहीं होता
पिंजरे में बंद सारिका ने
सीखी जो भी बोली-बानी
उसमें उसका अपना क्या है
साँसें हों या दाना-पानी
बंदीगृह तो बंदीगृह है
अपना संसार नहीं होता
तन का अधिकारी बनने से
मन पर अधिकार नहीं होता
RadhaKrishna Shukla 'Pathik'