निर्मल जल-सी निर्मल काया
मछली जैसे नैन
रूप का एक सरोवर तुम!
शैवालों-सी बिखरी अलकें, पलकें पंकज पात
आनन जैसे सावन का हो धुला-धुला जलजात
चाल करे अनुवाद लहर का
कल-कल धुनि से बैन
सृष्टि की मधुर धरोहर तुम!
रूप का एक सरोवर तुम!
नील गगन-सी नीलम-वसना, सूरज बिंदिया भाल
चन्द्रहार दिन बीते पहनो, ओढ़ो तारक शाल
युगल तटों-सी कोमल बाँहें
किसके बिन बे-चैन
प्रीति की माँग मनोहर तुम!
रूप का एक सरोवर तुम!
दूर रहो तो गीत रचाओ, पास रहो तो वेद
अंग लगो तो मिट ही जाए प्राण-प्राण का भेद
हट ही जाए भ्रम का पर्दा
कट ही जाए रैन
चैन दो मुझे सँजोकर तुम!
रूप का एक सरोवर तुम!
RadhaKrishna Shukla 'Pathik'