Vimal kumar vimal

दिनों दिन हार होती जा रही है,
फ़िज़ा बेकार होती जा रही है.

चराग़ों तुम ज़रा बच कर ही रहना,
हवा में धार होती जा रही है.

मुहब्बत का सफ़र करते थे जिस पे,
डगर दुश्वार होती जा रही है.

सियासत है नुकीली तेग़ यारो,
गले से पार होती जा रही है.

लिफ़ाफ़े का चलन जब से बढा़ है,
ग़ज़ल व्यापार होती जा रही है.

व्यवस्था का 'विमल' दम घुट रहा है,
बड़ी लाचार होती जा रही है.
Vimal kumar vimal

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