Swarika Kirti

भावना के मौन,मन की शून्यता पर,
कल्पना के आवरण कब तक चढ़ाऊं?
गीत ! तुमको ओढ़नी कब तक ओढ़ाऊं?

मर चुकी संवेदनाओं के शहर में,
हम सदी की त्रासदी को जी रहे हैं,
भर गया मन, कंठ नीले हो गए हैं,
हम अकेलापन,उदासी पी रहे हैं ।

हैं समय का शाप ये वीरानियां सब,
मानकर वरदान कब तक गुनगुनाऊं?

झूठ के घूंघट उतारो गीत सारे,
तुम बनो तस्वीर अब सच्चाइयों की,
मन बहलता ,राह पर कटती नहीं है,
उंगलियां पकड़े हुए परछाइयों की,

गीत ! है कर्तव्य,अब गीता बनो तुम,
रागिनी रणभूमि में कब तक सुनाऊं ?

दृष्टि पर अपनी नियंत्रण खो चुके हैं,
मुट्ठियों में सृष्टि को साधे हुए हम !
दूरियां मन की नहीं कर पा रहे तय,
डोरियां आकाश से बांधे हुए हम !

है जरूरी घाव को औषधि मिले अब,
मैं उसे श्रंगार से कब तक छिपाऊं ?
Swarika Kirti