वो गए तो फ़क़त उम्र ढलती रही
उनके जाने पे भी साँस चलती रही
ज़र्द पत्तों-सा मौसम गुज़रता रहा
एक तस्वीर आँखों में पलती रही
झील का पानी ऊपर से ठहरा ही था
तह-ब-तह कश्मकश सी मचलती रही
लफ़्ज़ होंठों पे आ कर लरज़ते रहे
ख़ामुशी ओढ़ कर आग जलती रही
ये ज़मीं तो यक़ीं पर खड़ी थी ‘अमन’
बादलों की सियासत बदलती रही
Aman Alfaaz