Surendra Bhatia 'Salil'

नए क़िस्से न हम पर आज़माएँ
जो बाक़ी रह गया था वो सुनाएँ

मोहब्बत की है इक औरत ने ऐसे
भुला दी पिछली सारी बेवफ़ाएँ

हमारा शहर में दिल लग गया है
लगी हैं गाँव की कुछ बद्दुआएँ

कहीं कोई शजर शायद गिरा है
तभी थोड़ी सी नम हैं ये हवाएँ

सलीक़े से कहेंगे तुम पे ग़ज़लें
ख़यालों का तो क्या है आएँ जाएँ

मिली माँ की दुआओं से है क़िस्मत
हैं क़िस्मत से मिली माँ की दुआएँ

'सलिल' ये बज़्म अब अपनी नहीं है
तकल्लुफ़ से ज़रा अब पेश आएँ
Surendra Bhatia 'Salil'